दिल्ली का प्रदूषण चरम पर.

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दिल्ली में हर साल एक्यूआई 300 से ऊपर दर्ज किया जाता है।

अक्टूबर-नवंबर की शुरुआत से ही राजधानी दिल्ली खराब वायु गुणवत्ता की चपेट में आ जाता है। 

दिल्ली के प्रदूषण में सबसे बड़ा योगदान वाहनों के धुएं का है। उसके बाद दिल्ली की हवा को प्रदूषित होती है ऊर्जा संयंत्रों, रिफाइनरियों, ईंट भट्टियों, फैक्टरियों, खेती, ऑर्गेनिक कचरे और खुले नालों से निकलने वाली गैसों से क्योंकि इन गैसों के आपस में मिलने से सल्फेट, नाइट्रेट, अमोनियम जैसे कण वातावरण में बनते हैं और हवा को प्रदूषित करते हैं। इसके बाद बारी आती है बायोमास यानी लकड़ियों, गोबर, पराली, सूखी पत्तियों और टहनियों को जलाने से निकलने वाले धुएं की। 

दिल्ली सरकार के आंकड़ों के मुताबिक राजधानी में 2021 तक 1.2 करोड़ से ज्यादा गाड़ियां थीं लेकिन 2022 में पुरानी डीजल और पेट्रोल गाड़ियों पर प्रतिबंध लगने से कुल गाड़ियों की संख्या 79.18 लाख पर आ गई। आँकड़ों की माने तो दिल्ली में हर एक हजार लोगों पर 472 गाड़ियां हैं। 

दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण की मार सबसे ज़्यादा वहाँ पर ईंट और सीमेंट की बोरियाँ ढोने वाले और निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मज़दूरों को झेलनी पड़ती हैं क्योंकि प्रदूषण के कारण निर्माण कार्यों पर रोक लग जाती है। हजारों मजदूर बेरोजगार हो जाते हैं। बेरोज़गारी के साथ साथ प्रदूषण की मार लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ रही है। 

दिल्ली में हर साल एक्यूआई 300 से ऊपर दर्ज किया जाता है। इससे शहर के लोगों में तरह-तरह की बीमारियां होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि वायु प्रदूषण से हर साल दुनिया भर में 42 लाख लोगों की मौत हो जाती है।

Photo Credit : ANI

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